गुरुवार, 2 अगस्त 2012

शहीद ऊधम सिंह


Today is Martyrdom day of Shaheed Udham Singh. My heartiest salute.


शहीद ऊधम सिंह जी का आज बलिदान दिवस है |



भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए सही समय का इंतज़ार करने लगा। ऊधमसिंह को अपने सैकड़ों भाई बहनों की मौत का बदला लेने का मौक़ा 1940 में मिला। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को 'रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी' की लंदन के 'कॉक्सटन हॉल' में बैठक थी जहाँ माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। ऊधमसिंह उस दिन समय से पहले ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। उन्होंने अपनी रिवाल्वर एक मोटी सी किताब में छिपा ली। उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवाल्वर के आकार में इस तरह से काट लिया, जिसमें डायर की जान लेने वाले हथियार को आसानी से छिपाया जा सके।

बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए ऊधमसिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियाँ चला दीं। दो गोलियाँ डायर को लगीं, जिससे उसकी तुरन्त मौत हो गई। गोलीबारी में डायर के दो अन्य साथी भी घायल हो गए। ऊधमसिंह ने वहाँ से भागने की कोशिश नहीं की और स्वयं को गिरफ़्तार करा दिया। उन पर मुक़दमा चला। अदालत में जब उनसे सवाल किया गया कि 'वह डायर के साथियों को भी मार सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया।' इस पर ऊधमसिंह ने उत्तर दिया कि, वहाँ पर कई महिलाएँ भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है। अपने बयान में ऊधमसिंह ने कहा- 'मैंने डायर को मारा, क्योंकि वह इसी के लायक़ था। मैंने ब्रिटिश राज्य में अपने देशवासियों की दुर्दशा देखी है। मेरा कर्तव्य था कि मैं देश के लिए कुछ करूं। मुझे मरने का डर नहीं है। देश के लिए कुछ करके जवानी में मरना चाहिए।'

सोमवार, 30 जुलाई 2012

कालका मन्दिर , लखना इटावा

कालका मन्दिर , लखना इटावा


अटूट आस्था का केन्द्र है लखना कालि‍का मंदि‍ ( BY-मनोज ति‍वारी) जनपद इटावा के कस्बा लखना में स्थित काली देवी का मंदि‍र अपना एक वि‍शेष महत्व है। इस मंदि‍र की स्थापना वर्ष 1857 में की गई थी। मालूम हो कि‍ 1857 का स्वाधीनता आन्दोलन में अपना अलग ही महत्व है। इस मंदि‍र की लम्बाई करीब 400 फुट और चौड़ाई करीब 200 फुट है। इस देवी मंदि‍र की खास वि‍शेषता ये है कि‍ ठीक बगल में सैयद बाबा का कच्चा थान है। जो मुसलमानों के लि‍ए श्रद्धा का केन्द्र तो है ही, साथ ही हि‍न्दुओं के लि‍ए देवी मॉ के साथ ही बाबा के प्रति‍ भी समान आस्था का केन्द्र है। हजारों लोग एक साथ दोनों की पूजा अर्चना करते है। लखना के इस कालका देवी मंदि‍र में वर्ष में दो मेले लगते है। एक चैत्र सुधि‍ पूर्णमा को और दूसरा क्वार की नवरात्र में लगता है। दूर-दूर स्थानों से आने वाले लोग अपनी मनोति‍यां मानते है और पूरी होने पर झण्डा और घंटा चढ़ाते है। मान्यता है कि‍ इस मंदि‍र का नि‍र्माण राजाराव जसवन्त सिंह ने कराया था। ऐसा सुना जाता है कि‍ राजा नि‍यमि‍त यमुना नदी पार कर घार में स्थित देवी मंदि‍र के दर्शन करने जाते थे। एक दि‍न यमुना नदी में बहाव अधि‍क होने के कारण मल्लाओं ने भी नाव पार होना असुरक्षि‍त बताया तो राजा बड़े मायूस हो गये और एक पेड़ की छांव में बैठकर दुखी होकर सोच-वि‍चार करने लगे। अचानक देवीय रूप से आग जली और राजा जसवंत सिंह ने उसी स्थान पर देवी मंदि‍र का नि‍र्माण शुरू करा दि‍या। सैयद बाबा के बगल में देवी की स्थापना के बाद एक और देवी मंदि‍र की स्थापना करने का मन बनाया लेकि‍न इससे पूर्व ही राजा का देहावसान हो गया और स्थापना के लि‍ए मंगबाई गई मूर्ति‍ ऊपर के कमरे में रखी हुई है, जि‍सकी पूजा अर्चना परि‍वारी जन करते है। मंदि‍र परि‍सर में ही सैयद बाबा की मजार है जि‍स पर चादर और कौढ़ि‍या बताशे चढ़ाते है। चढ़ावा मुस्लिम खि‍दमतगार देता है। ऐसा मान्यता है कि‍ महामाया तब तक मंनत मंजूर नहीं करती है जब तक सैयद बाबा को चढ़ावा नहीं मि‍लता है। मंदि‍र की देख-रेख लखना राज परि‍वार के लोग करते आ रहे है। इस मंदि‍र में दलि‍त पुजारी ही वर्षों से पूजा करते आ रहे है। साथ ही मंदि‍र में बधाई डालने और ढोलक बजाने का कार्य दलि‍त और कोरी जाति‍ की महि‍लायें करती आ रही है। इसी प्रकार सैयद बाबा की मजार पर भी दूदे खान और गफफार खान की कई पीड़ियां इवादत करती आ रहीं है। इस मंदि‍र के प्रति‍ जि‍तनी आस्था जि‍ले और आस-पास के जनपदों के लोगों की है उतनी ही आस्था डकैतों में भी रही है। पूर्व में अनेकों नामी गि‍रामी डकैतों ने पुलि‍स से बचते-बचाते झंडा चढ़ाने में कामयाब भी रहे। देवी मॉ की ऐसी कृपा रही कि‍ पुलिस की व्यापक कि‍ले बन्दी भी इनका कुछ नहीं बि‍गाड़ सकी। वेष बदलकर दस्यु मोहर सिंह गुर्जर, मलखान सिंह, छवि‍ राम, घनश्याम उर्फ घन्सा बाबा, नि‍र्भय गूजर और महि‍ला दस्यु सुन्दरी फूलन देवी सभी यहां आकर झंडा और घंटा चढ़ा चुके है।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

Vande matram

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
सस्य श्यामलां मातरंम् .
शुभ्र ज्योत्सनाम् पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम् .
सुखदां वरदां मातरम् ॥

सप्त कोटि कन्ठ कलकल निनाद कराले
द्विसप्त कोटि भुजैर्ध्रत खरकरवाले
के बोले मा तुमी अबले
बहुबल धारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम् ॥

तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि ह्रदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे ॥

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् ॥

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
धरणीं भरणीं मातरम् ॥

लक्ष्मी सहगल

लक्ष्मी सहगल (जन्म: 24 अक्टूबर, 1914-देहावसान: 23 जुलाई 2012 ) भारत की स्वतंत्रता संग्राम की सेनानी हैं। वे आजाद हिन्द फौज की अधिकारी तथा 'आजाद हिन्द सरकार' में महिला मामलों की मंत्री थीं। वे व्यवसाय से डॉक्टर थी जो द्वितीय विश्वयुद्धके समय प्रकाश में आयीं। वे आजाद हिन्द फौज की 'रानी लक्ष्मी रेजिमेन्ट' की कमाण्डर थीं।
डॉक्टर लक्ष्मी सहगल का जन्म 1914 में एक परंपरावादी तमिल परिवार में हुआ और उन्होंने मद्रास मेडिकल कॉलेज से मेडिकल की शिक्षा ली, फिर वे सिंगापुर चली गईं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब जापानी सेना ने सिंगापुर में ब्रिटिश सेना पर हमला किया तो लक्ष्मी सहगल सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गईं थीं।
वे बचपन से ही राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित हो गई थीं और जब महात्मा गाँधी ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आंदोलन छेड़ा तो लक्ष्मी सहगल ने उसमे हिस्सा लिया। वे 1943 में अस्थायी आज़ाद हिंद सरकार की कैबिनेट में पहली महिला सदस्य बनीं। एक डॉक्टर की हैसियत से वे सिंगापुर गईं थीं लेकिन 87 वर्ष की उम्र में वे अब भी कानपुर के अपने घर में बीमारों का इलाज करती थीं।
आज़ाद हिंद फ़ौज की रानी झाँसी रेजिमेंट में लक्ष्मी सहगल बहुत सक्रिय रहीं। बाद में उन्हें कर्नल का ओहदा दिया गया लेकिन लोगों ने उन्हें कैप्टन लक्ष्मी के रूप में ही याद रखा।
आज़ाद हिंद फ़ौज की हार के बाद ब्रिटिश सेनाओं ने स्वतंत्रता सैनिकों की धरपकड़ की और 4 मार्च 1946 को वे पकड़ी गईं पर बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। लक्ष्मी सहगल ने 1947 में कर्नल प्रेम कुमार सहगल से विवाह किया और कानपुर आकर बस गईं। लेकिन उनका संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ और वे वंचितों की सेवा में लग गईं। वे भारत विभाजन को कभी स्वीकार नहीं कर पाईं और अमीरों और ग़रीबों के बीच बढ़ती खाई का हमेशा विरोध करती रही।
यह एक विडंबना ही है कि जिन वामपंथी पार्टियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान का साथ देने के लिए सुभाष चंद्र बोस की आलोचना की, उन्होंने ही लक्ष्मी सहगल को भारत के राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया। लेकिन वामपंथी राजनीति की ओर लक्ष्मी सहगल का झुकाव 1971 के बाद से बढ़ने लगा था। वे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की संस्थापक सदस्यों में से थीं।

चंद्रशेखर आज़ाद

माँ भारती के अमर सपूत महान क्रांतिकारी, बलिदानी और युवाओ के प्रेरणास्रोत चंद्रशेखर आज़ाद जी को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन ...

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

सिखों के छठवें गुरुगुरु हरगोबिंद सिंह

गुरु हरगोबिंद सिंह जयंती: सिखों के छठवें गुरु


Guru Hargobind Singh Jayanti

सिख समाज की स्थापना का मुख्य मकसद ही धर्म की रक्षा करना था. सिख समाज के दस गुरुओं ने इस धर्म को दुनिया की निगाहों में सबसे ऊपर रखने में मदद की. इन्हीं गुरुओं में से एक थे गुरु हरगोबिंद सिंह.


Guru Hargovind Singh

गुरु हरगोबिंद सिंह सिखों के छठे गुरु थे. यह सिखों के पांचवें गुरु अर्जुनसिंह के पुत्र थे. गुरु हरगोबिंद सिंह ने ही सिखों को अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया व सिख पंथ को योद्धा चरित्र प्रदान किया. वे स्वयं एक क्रांतिकारी योद्धा थे. आज गुरु हरगोबिंद सिंह की जयंती है.


Guru Hargovind Singhs Profile in Hindi

गुरु हरगोबिंद सिंह का शुरू से ही युद्ध के प्रति झुकाव था. गुरु हरगोबिंद सिंह ने अपना ज्यादातर समय युद्ध प्रशिक्षण एव युद्ध कला में लगाया. मुगलों के विरोध में गुरु हरगोबिंद सिंह ने अपनी सेना संगठित की और अपने शहरों की किलेबंदी की.


Guru Hargovind Singhs Fight

मुगल बादशाह जहांगीर ने सिखों की मजबूत होती हुई स्थिति को खतरा मानकर गुरु हरगोबिंद सिंह को ग्वालियर में कैद कर लिया. गुरु हरगोबिंद सिंह बारह वर्षों तक कैद में रहे लेकिन उनके प्रति सिखों की आस्था और मज़बूत हुई. रिहा होने पर उन्होंने शाहजहां के खिलाफ बगावत कर दी और 1628 ई. में अमृतसर के निकट संग्राम में शाही फौज को हरा दिया.


मुगलों की अजेय सेना को गुरु हरगोबिंद सिंह ने चार बार हराया था. अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित आदर्शों में गुरु हरगोबिंद सिंह ने एक और आदर्श जोड़ा, सिक्खों का यह अधिकार और कर्तव्य है कि अगर जरुरत हो तो वे तलवार उठाकर भी अपने धर्म की रक्षा करें.



गुरु हरगोबिंद सिंह केवल धर्मोपदेशक ही नहीं, कुशल संगठनकर्ता भी थे. गुरु हरगोबिंद सिंह ने ही अमृतसर में अकाल तख्त (ईश्वर का सिंहासन) का निर्माण किया. उन्होंने अमृतसर के निकट एक किला बनवाया और उसका नाम लौहगढ़ रखा. उन्होंने बड़ी कुशलता से अपने अनुयायियों में युद्ध के लिए इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास पैदा किया.


लेकिन सन 1644 ई. में कीरतपुर (पंजाब) भारत में उनकी मृत्यु हो गई. लेकिन गुरु हरगोबिन्द सिंह ने सिख धर्म को जरूरत के समय शस्त्र उठाने की ऐसी सीख दी जो आज भी सिख धर्म की पहचान है.

स्वामी विवेकानंद

Swami Vivekananda’s Profile – स्वामी विवेकानंद:

Swami Vivekananda Profile in Hindi

आधुनिक भारत की पहचान विश्व में एक ऐसे देश की है जिसकी संस्कृति और विरासत का दूसरा कोई सानी नहीं. भारत को सोने की चिड़िया, ज्ञान का देश ऐसे ही नहीं कहा जाता था. लेकिन इस देश को विश्व में पहचान दिलाने में हमारे महापुरुषों का अहम रोल रहा है. स्वामी विवेकानंद एक ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने आधुनिक भारत की नींव रखी और दुनिया के मानचित्र पर भारत का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराया. भारतीय संस्कृति और धर्म दर्शन को उन्होंने दुनियाभर में श्रेष्ठ सिद्ध किया.


swami vivekanand Swami Vivekananda Quote

स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के एक क्रांतिकारी विचारक माने जाते हैं. 12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता में जन्मे स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ था. इन्होंने अपने बचपन में ही परमात्मा को जानने की तीव्र जिज्ञासावश तलाश आरंभ कर दी. इसी क्रम में उन्होंने सन 1881 में पहली बार रामकृष्ण परमहंस से भेंट की और उन्हें अपना गुरु स्वीकार कर लिया तथा अध्यात्म-यात्रा पर चल पड़े. काली मां के अनन्य भक्त स्वामी विवेकानंद ने आगे चलकर अद्वैत वेदांत के आधार पर सारे जगत को आत्म-रूप बताया और कहा कि “आत्मा को हम देख नहीं सकते किंतु अनुभव कर सकते हैं. यह आत्मा जगत के सर्वांश में व्याप्त है. सारे जगत का जन्म उसी से होता है, फिर वह उसी में विलीन हो जाता है. उन्होंने धर्म को मनुष्य, समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए स्वीकार किया और कहा कि धर्म मनुष्य के लिए है, मनुष्य धर्म के लिए नहीं. भारतीय जन के लिए, विशेषकर युवाओं के लिए उन का नारा था – “उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति होने तक रुको मत.”


Swami Vivekananda speech in Chicago

31 मई, 1883 को वह अमेरिका गए. 11 सितंबर, 1883 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में उपस्थित होकर अपने संबोधन में सबको भाइयों और बहनों कह कर संबोधित किया. इस आत्मीय संबोधन पर मुग्ध होकर सब बड़ी देर तक तालियां बजाते रहे. वहीं उन्होंने शून्य को ब्रह्म सिद्ध किया और भारतीय धर्म दर्शन अद्वैत वेदांत की श्रेष्ठता का डंका बजाया. उनका कहना था कि आत्मा से पृथक करके जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु से प्रेम करते हैं, तो उसका फल शोक या दुख होता है. अत: हमें सभी वस्तुओं का उपयोग उन्हें आत्मा के अंतर्गत मान कर करना चाहिए या आत्म-स्वरूप मान कर करना चाहिए ताकि हमें कष्ट या दुख न हो.


अमेरिका में चार वर्ष रहकर वह धर्म-प्रचार करते रहे तथा 1887 में भारत लौट आए. भारतीय धर्म-दर्शन का वास्तविक स्वरूप और किसी भी देश की अस्थिमज्जा माने जाने वाले युवकों के कर्तव्यों का रेखांकन कर स्वामी विवेकानंद सम्पूर्ण विश्व के जननायक बन गए.


Swami Vivekanandas quote

फिर बाद में विवेकानंद ने 18 नवंबर,1896 को लंदन में अपने एक व्याख्यान में कहा था, मनुष्य जितना स्वार्थी होता है, उतना ही अनैतिक भी होता है. उनका स्पष्ट संकेत अंग्रेजों के लिए था, किंतु आज यह कथन भारतीय समाज के लिए भी कितना अधिक सत्य सिद्ध हो रहा है.


Swami Vivekanandas quote on Freedom

पराधीन भारतीय समाज को उन्होंने स्वार्थ, प्रमाद व कायरता की नींद से झकझोर कर जगाया और कहा कि मैं एक हजार बार सहर्ष नरक में जाने को तैयार हूं यदि इससे अपने देशवासियों का जीवन-स्तर थोडा-सा भी उठा सकूं.


स्वामी विवेकानंद ने अपनी ओजपूर्ण वाणी से हमेशा भारतीय युवाओं को उत्साहित किया है. उनके उपदेश आज भी संपूर्ण मानव जाति में शक्ति का संचार करते है. उनके अनुसार, किसी भी इंसान को असफलताओं को धूल के समान झटक कर फेंक देना चाहिए, तभी सफलता उनके करीब आती है. स्वामी जी के शब्दों में हमें किसी भी परिस्थिति में अपने लक्ष्य से भटकना नहीं चाहिए‘.


Swami Vivekanandas Death

स्वामी विवेकानंद ने अशिक्षा, अज्ञान, गरीबी तथा भूख से लडने के लिए अपने समाज को तैयार किया और साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय चेतना जगाने, सांप्रदायिकता मिटाने, मानवतावादी संवेदनशील समाज बनाने के लिए एक आध्यात्मिक नायक की भूमिका भी निभाई. 4 जुलाई, 1902 को कुल 39 वर्ष की आयु में विवेकानंद जी का निधन हो गया. इतनी कम उम्र में भी उन्होंने अपने जीवन को उस श्रेणी में ला खड़ा किया जहां वह मरकर भी अमर हो गए.


जब-जब मानवता निराश एवं हताश होगी, तब-तब स्वामी विवेकानंद के उत्साही, ओजस्वी एवं अनंत ऊर्जा से भरपूर विचार जन-जन को प्रेरणा देते रहेंगे और कहते रहेंगे-उठो जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति से पूर्व मत रुको.’


युवाओं के प्रेरणास्त्रोत -आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद (Profile of Swami Vivekananda)