गुरुवार, 12 जुलाई 2012

पहलवान दारा सिंह

जिंदगी की जंग हार गए पहलवान दारा सिंह !!

पोस्टेड ओन: 12 Jul, 2012 जनरल डब्बा में

DARA-SINGHटी.वी. के हनुमान और अखाड़े के पहलवान दारा सिंह, जिन्होंने ना जाने कितने दिग्गजों को हार का स्वाद चखाया, आज अपनी जिंदगी की जंग हार गए. एक लंबी बीमारी से जूझते हुए उन्होंने आज सुबह यानि गुरुवार 12 जुलाई सुबह 7.30 बजे अपनी अंतिम सांसे लीं. पिछले कई दिनों से दारा सिंह कोकिला बेन अस्पताल में भर्ती थे. रुस्तम-ए-हिंद दारा सिंह के बेटे बिंदू दारा सिंह की इच्छा थी कि उनके पिता की मृत्यु अस्पताल में नहीं बल्कि उनके अपने घर में हो, इसीलिए डॉक्टरों ने जब उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया तो उनके परिजन उन्हें घर ले आए. दारा सिंह के स्वास्थ्य के लिए पूरा देश प्रार्थना कर रहा था लेकिन कोकिला बेन अस्पताल के डॉक्टरों की लाख कोशिशों के बाद भी दारा सिंह अपनी मृत्यु को टाल नहीं पाए.


84 वर्षीय दारा सिंह को बीती 7 जुलाई को दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया था. तभी से वे आईसीयू में थे. अस्पताल के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर डॉक्टर राम नारायण कहना है कि एमआरआई के बाद यह पता चला कि ऑक्सीजन की कम आपूर्ति होने के कारण उनके मस्तिष्क को काफी नुकसान पहुंचा है.


दारा सिंह का जीवन

दारा सिंह का जन्म 19 नवंबर, 1928 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था. इनका पूरा नाम दारा सिंह रंधावा है. बचपन से ही वह मजबूत कद-काठी के थे यही वजह है कि उनका कुश्ती के प्रति रुझान उत्पन्न होने लगा. अखाड़े में देर तक कुश्ती के दांव-पेंच सीखने वाले दारा सिंह पहले मेलों और अन्य समारोहों में कुश्ती प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते थे. धीरे-धीरे उनकी पहलवानी को मान्यता मिलने लगी और वह भारत के एक प्रमुख और एक कुशल पहलवान बन गए.


दारा सिंह का कॅरियर (पहलवानी)

पहलवान के रूप में ख्याति प्राप्त करने के तुरंत बाद वह व्यवसायिक पहलवानी के लिए अमेरिका चले गए. अमेरिका में उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में अपने प्रतिद्वंदियों को धूल चटाई. उन्होंने कई नामी पहलवानों को हराया जिसमें अपने समय के सबसे विख्यात पहलवान लोउ थीज भी शामिल हैं.


दारा सिंह का कॅरियर (फिल्मी)

भारत वापस आने पर उन्होंने कई फिल्मों में भी काम किया पर शुरुआत में उनके साथ काम करने में नायिकाएं असहज महसूस करती थीं क्योंकि दारा सिंह का भारी-भरकम शरीर उन्हें अजीब लगता था. एक तरफ बॉलिवुड की फूल जैसे नायिकाएं दूसरी तरह रफ एंड टफ दारा सिंह. लीड हीरो के तौर पर दारा सिंह ने कई फिल्मों में काम किया जिसमें से सबसे ज्यादा 16 फिल्मों में उन्होंने मुमताज के साथ काम किया था.


dara1980 और 90 के दशक में दारा सिंह के जीवन में असली मोड़ आया जब टीवी शो `रामायण ने उनकी किस्मत ही बदल दी. रामानंद सागर द्वारा प्रस्तुत रामायण में दारा सिंह को हनुमान का किरदार दिया गया. इस किरदार में दारा सिंह कुछ यूं समां गए कि आज भी लोग उन्हें रामायण का हनुमान कहकर पुकारते हैं. इसके बाद से दारा सिंह ने कई धार्मिक टीवी सीरियलों में हनुमान का किरदार भी निभाया.


दारा सिंह ने 100 से अधिक फिल्मों में काम किया है. उन्होंने अधिकतर फिल्मों में सह अभिनेता या पिता-दादा की भूमिका निभाई है. हाल ही में दारा सिंह “जब वी मेट” और “रेडी” जैसी फिल्मों में दिखे थे. दारा सिंह के तीन बेटे हैं जिनके नाम बिंदु दारा सिंह, प्रद्युमन सिंह रंधावा और अमरीक सिंह हैं.


दारा सिंह ने कैनेडियन ओपन टेग टीम चैंपियनशिप, रुस्तम-ए-पंजाब, रुस्तम-ए-हिंद जैसे खिताब जीते हैं. भारतीय जनता पार्टी ने साल 2003 में दारा सिंह को राज्य सभा के लिए नामांकित किया था.


खजुराहो

खजुराहो भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त में स्थित एक प्रमुख शहर है जो अपने प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिये विश्वविख्यात है। यह मध्य प्रदेश के छतरपुरजिले में स्थित है। खजुराहो को प्राचीन काल में खजूरपुरा और खजूर वाहिका के नाम से भी जाना जाता था। यहां बहुत बड़ी संख्या में प्राचीन हिन्दू और जैन मंदिर हैं। मंदिरों का शहर खजुराहो पूरे विश्व में मुड़े हुए पत्थरों से निर्मित मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। खजुराहो को इसके अलंकृत मंदिरों की वजह से जाना जाता है जो कि देश के सर्वोत्कृष्ठ मध्यकालीन स्मारक हैं। भारत के अलावा दुनिया भर के आगन्तुक और पर्यटक प्रेम के इस अप्रतिम सौंदर्य के प्रतीक को देखने के लिए निरंतर आते रहते है। हिन्दू कला और संस्कृति को शिल्पियों ने इस शहर के पत्थरों पर मध्यकाल में उत्कीर्ण किया था।
खजुराहो का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है। यह शहर चन्देल साम्राज्‍य की प्रथम राजधानी था। चन्देल वंश और खजुराहो के संस्थापक चन्द्रवर्मन थे।चन्द्रवर्मन मध्यकाल में बुंदेलखंड में शासन करने वाले राजपूत राजा थे। वे अपने आप का चन्द्रवंशी मानते थे। चंदेल राजाओं ने दसवीं से बारहवी शताब्दी तक मध्य भारत में शासन किया। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईसवीं से 1050 ईसवीं के बीच इन्हीं चन्देल राजाओं द्वारा किया गया। मंदिरों के निर्माण के बाद चन्देलो ने अपनी राजधानी महोबा स्थानांतरित कर दी। लेकिन इसके बाद भी खजुराहो का महत्व बना
जब से ब्रिटिश इंजीनियर टी एस बर्ट ने खजुराहो के मंदिरों की खोज की है तब से मंदिरों के एक विशाल समूह को 'पश्चिमी समूह' के नाम से जाना जाता है। यह खजुराहो के सबसे आकर्षक स्थानों में से एक है। इस स्थान को युनेस्को ने 1986 में विश्व विरासत की सूची में शामिल भी किया है। इसका मतलब यह हुआ कि अब सारा विश्व इसकी मरम्मत और देखभाल के लिए उत्तरदायी होगा।
इस परिसर के विशाल मंदिरों की बहुत ज्यादा सजावट की गई है। यह सजावट यहां के शासकों की संपन्नता और शक्ति को प्रकट करती है। इतिहासकारों का मत है कि इनमें हिन्दू देवकुलों के प्रति भक्ति भाव दर्शाया गया है। देवकुलों के रूप में या तो शिव या विष्णु को दर्शाया गया है। इस परिसर में स्थित लक्ष्मण मंदिर उच्च कोटि का मंदिर है। इसमें भगवान विष्णु को बैकुंठम के समान बैठा हुआ दिखाया गया है। चार फुट ऊंची विष्णु की इस मूर्ति में तीन सिर हैं। ये सिर मनुष्य, सिंह और वराह के रूप में दर्शाए गए हैं। कहा जाता है कि कश्मीर के चम्बा क्षेत्र से इसे मंगवाया गया था। इसके तल के बाएं हिस्से में आमलोगों के प्रतिदिन के जीवन के क्रियाकलापों, कूच करती हुई सेना, घरेलू जीवन तथा नृतकों को दिखाया गया है।
मंदिर के प्लेटफार्म की चार सहायक वेदियां हैं। 954 ईसवीं में बने इस मंदिर का संबंध तांत्रिक संप्रदाय से है। इसका अग्रभाग दो प्रकार की मूर्तिकलाओं से सजा है जिसके मध्य खंड में आलिंगन करते हुए दंपत्तियों को दर्शाता है। मंदिर के सामने दो लघु वेदियां हैं। एक देवी और दूसरा वराह देव को समर्पित है। विशाल वराह की आकृति पीले पत्थर की चट्टान के एकल खंड में बनी है। —

बुधवार, 11 जुलाई 2012

रमायन का शिव मन्दिर

महाभारतकालीन se है रमायन का शिव मन्दिर (By Etawah live)
Etawah इटावा
जनपद इटावा की भरथना तहसील के ग्राम रमायन में महाशि‍वरात्रि‍ या श्रावण माह के सोमवार भरथना क्षेत्र के ग्राम रमायन में स्थित और भारतीय संस्कृति की विरासत संजोने वाले करीब चार सौ वर्ष पु्राने और महाभारत कालीन शिव मन्दिर के प्रति‍ शि‍व भक्तों की आस्था काफी गहराई तक जुडी हुई है। मंदि‍र में माता अपूर्णा की मूर्ति‍ भी स्‍थापि‍त है, ग्रामीणों के अनुसार उनके गांव में कभी कोई दैवीय आपदा नहीं होना इस मंदि‍र का ही चमत्‍कार है। कहना है कि‍ इस मंदि‍र से कि‍सी भी भक्‍त की मनोकामना कभी अधूरी नहीं रही है। यही वजह है सोमवार को बड़ी संख्‍या में शि‍वभक्‍त भोले बाबा और माता अर्पूणा के दर्शन करने जरुर आतें हैं। श्रावण माह और महाशि‍वरात्रि‍ पर्व के अवसर पर बड़ी संख्‍या में शि‍वभक्‍त कांवरों में गंगाजल भरकर लाने के बाद भोले बाबा को अर्पि‍त करते है,कुछ मनोकामना पूरी होने पर तो कुछ पूरी होने के लि‍ए कांवर भरकर लाते हैं और शि‍वलिंग पर चढाते है। महाशि‍वरात्रि‍ के अवसर पर मेला का आयोजन भी कि‍या जाता है। 2012

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

सब्जी धोने कीमशीन


घर का आविष्कार
बाडोपट्टी गांव निवासी 34 वर्षीय महाबीर जांगड़ा ने न तो कभी किसी इंजिनियर कॉलेज में दाखिला लिया और न ही कृषि यंत्र बनाने का विशेष प्रशिक्षण । छह जमात पास करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी। उम्र कम थी लेकिन तभी से कृषि यंत्र बनाने में रुचि पैदा हुई।

छोटी-मोटी मशीनें बनाने की शुरुआत घर पर ही हुई और आज इनकी तकनीक का जादू पूरे प्रदेश में चलता है। महाबीर को पहली सफलता 15 वर्ष पूर्व गाजर धोने कीमशीन के साथ लगी। आठ साल पहले अदरक, अरबी धोने की मशीन तैयार की। इससे पहले ये मशीनें हाथों से चलती थीं। एक व्यक्ति एक दिन में करीब 2 क्विंटल सब्जियां धो पाता था। महाबीर की बनाई मशीन से एक घंटे में 100 क्विंटल के लगभग सब्जी धोई जा सकती हैं। इसके अलावा सर्दियों में गाजर धोने में किसानों को बर्फ जमा देने वाली ठण्ड से भी पूर्ण राहत मिली है। अब महाबीर ने स्प्रे पंप भी आधुनिक तकनीक के तैयार किए हैं। मिस्त्री महाबीर जांगड़ा ने बताया कि उपरोक्त कृषि यंत्र पर राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 50 प्रतिशत की सबसिडी मिलती है। वे बताते हैं कि उनकी बनाई गई मशीनों को सोनीपत, फरमाणा, अलीगढ़, दिल्ली, फतेेहाबाद, भिवानी के किसान आते हैं। उन्होंने बताया कि एक मशीन को बनाने में छ: महीने का समय लगता है।

मशीन में लगने वाला सामान हिसार, लुधियाना व टोहाना से खरीद कर लाया जाता है। एक मशीन पर 90 हजार रुपये की लागत आती है और इस मशीन को 1 लाख 5 हजार रुपये तक बेचा जाता है। वे कपास बीजने, स्प्रे पंप आदि मशीनें भी बना रहे हैं। इसके अलावा हल्दी धोने की मशीन भी जल्द ही बना ली जाएगी। उन्होंने बताया कि उनके पिता सीताराम जांगड़ा बहबलपुर बस स्टैंड पर वेल्डिंग का कार्य करते थे, वह उन्हीं के नक्शे कदम पर चलकर इस कार्य में जुड़े।

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

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बुधवार, 28 मार्च 2012

rail regional specialty food items way station


rail regional specialty food items way stations are famous for
I found this list on the internet.
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Some stations on Indian Railways are famous for the regional specialty food items available there. Below follows a list of some of them. Compiled by Sukrut Thipse.

Pune - Tea, Misal, and Patties in the canteen
Karjat - Batata vada / vada pav (Potato snack)
Lonavala - Chocolate Fudge / Cashewnut Chikki (cashewnut brittle candy)
Neral - Seasonal Jambhool fruit
Khandala - Seasonal Jamoon fruit (plums)
Solapur - Kunda (sweet barfi)
Kolhapur - Sugarcane juice
Miraj - Saar and Rice
Hubli - Hubli rice (Curd rice (yogurt rice) with onions, chile peppers, and pickles)
Mysore - Dosa
Tiruchirapalli - Bondas in several variations
Hyderabad - Chicken biryani
Calicut (Kozhikode) - Dal vada
Quilon - Rasam
Mangalore - Egg Biryani
Ernakulam - Fried yellow bananas
Nagpur - Bhujia, and oranges
Guntakal - Mango jelly
Chennai Central - Samosas, idli, dosa
Rameshwaram - Idiuppam (Rice Noodles)
Agra - Petha (candied pumpkin)
New Delhi - Aloo chat (tangy potato snack)
Indore - Farsan
Ahmedabad - Vadilal ice-cream
Surat - Undhyo (mixed vegetables)
Ranchi - Puri bhaji
Howrah - Sandesh
Amritsar - Lassi, Aloo paratha
Bangalore - Vada sambar, fresh fruit juices
Jaipur - Dal bati
Gandhidham - dabeli
Varanasi - Seasonal amrud fruit (guava)
Gorakhpur - Rabdi (a sweet made of milk and sugar)
Guwahati - Tea (Assam blend)
Madurai - Uthappam (spicy lentil/rice pancake)
Ajmer - Mewa (Mix fruit)
Vasco-da-gama - Fish curry/cutlets
Ratnagiri - Mangoes, dried jackfruit
Vijayawada - Fruit juices
Rajahmundry - Bananas
Daund - Peanuts
Tirupati - Ladoos, sevai
Londa - Jackfruit
Allahabad - Motichur ladoos
Ambala - Aloo paratha
Puri - Halwah
Bhubaneshwar - Dal and rice
Coimbatore - Sambar-rice, tamarind-rice, lemon-rice
Dehradun - Salted cucumber
Gwalior, Bhopal - Boiled chickpeas with chile peppers
Surendranagar - Tea with camel's milk
Anand - Gota (fenugreek fritters), and milk from the dairy farm there
Khambalia Junction - Potato/onion/chili fritters
Dwaraka - Milk pedhas
Viramgam - Fafda (ganthiya), Poori + Alu-bhaji
Pendra Road - Samosas
Manikpur - Cream
Thanjavur - Salted cashewnuts
Bharuch - Peanuts
Maddur - Maddur-vade
Chinna Ganjam - Cashewnuts
Gudur - Lemons
Panruti - Jackfruit
Virudunagar - Boli (a thick sweet flat bread)
Sankarankoil - Chicken biryani
Srivilliputtur - Paal kova (a soft milk-based sweet)
Manapparai - Murukku

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

क्रेडिट कार्ड


अपना पैसा डॉटकॉम के सीईओ हर्ष रूंगटा का कहना है कि लोन और क्रेडिट कार्ड से जुड़ी समस्याओं को लिखित में सुलझाना ज्यादा बेहतर विकल्प होता है। बदलते समय में अक्सर ग्राहक इन समस्याओं को फोन पर सुलझाने की कोशिश करते हैं। शिकायतों की लिखित शिकायत के जरिए पक्की लिखा-पढ़त करें और एक्नॉलिजमेंट जरुर लें। इन सब बातों में कुछ ज्यादा समय अवश्य लगता है लेकिन आप भविष्य में भारी परेशानी से बच सकते हैं।

अगर बैंक से लोन लिया है और दो ईएमआई के बीच अगर किस्त के भुगतान में कुछ देरी होती है तो इसे ब्रोकन पीरियड कहा जाता है। ब्रोकन पीरियड के दौरान बैंक कुछ पेनेल्टी लगाते हैं। इस रकम का भुगतान करना जरुरी होता है लेकिन ग्राहक इस चार्ज की पूरी जानकारी ले सकता है। अगर बैंक ये जानकारी देने से मना करता है तो इसके खिलाफ बैंकिंग एम्बुड्समैन में शिकायत की जा सकती है।

इसके अलावा अगर बैंक से लोन को समय से पहले बंद करते हैं तो बैंक कुछ अतिरिक्त शुल्क भी वसूलते हैं। इस रकम के बारे में भी सारी जानकारी देना जरूरी होता है। बैंक आपसे अनावश्यक चार्ज नहीं वसूल सकते हैं।

अक्सर कई ग्राहकों को बीमा पॉलिसी लेने और वापस करने के दौरान समस्या से जूझना पड़ता है अगर प्रीमियम का भुगतान क्रेडिट कार्ड के जरिए किया जा रहा है। हर्ष रूंगटा के मुताबिक अगर पॉलिसी बंद कराने या वापस करने के बाद भी क्रेडिट कार्ड कंपनी चार्ज वसूल रही हैं तो इसके खिलाफ लिखित में शिकायत दर्ज करें। जिस बैंक का क्रेडिट कार्ड है उसे दो हफ्ते के भीतर इस मामले की सारी जानकारी ग्राहकों को मुहैया कराना जरुरी है।

हर्ष रूंगटा के मुताबिक एक ही नाम पर एक बैंक से एक से ज्यादा क्रेडिट कार्ड इश्यू हो सकते है। अगर अनसिक्योर्ड कार्ड चाहते हैं तो आपके पहले के सभी भुगतान पूरे होने चाहिए। आपका क्रेडिट रिकॉर्ड अच्छा होना चाहिए। बैंक के ऊपर क्रेडिट कार्ड इश्यू से संबंधित कोई सीमा नहीं है। हालांकि ग्राहक को उसी सूरत में क्रेडिट कार्ड की संख्या बढ़ानी चाहिए अगर वाकई जरुरत हो।
केतुल शाह
एक चित्र है। यह 7 अगस्त का दिन है, लेकिन कुछ लापरवाह पार्टीबाजी के कारण आपके पास केवल 2,000 रुपए ही बैंक खाते में बचे हैं। अब भी यह महीना आधा बाकी है।
आपकी कार की किस्त (ईएमआ) 10 तारीख को 8,000 रुपए जानी है। आप इसे लेकर परेशान हैं। चैक बाउंस होने का मतलब है कि पेनाल्टी और ब्याज भरना होगा। आप पिताजी को फोन करते हैं, जो दूसरे शहर में रहते हैं। उनसे अपने खाते में चैक लगाने का आग्रह करते हैं। वह चैक लगाते हैं लेकिन क्या यह ईएमआई के पहले खाते में आ जाएगा।

कोई चैक कितना समय लेता है?
चैक की प्रोसेसिंग में लगने वाला समय कुछ बातों पर निर्भर करता है-
•    लोकल क्लीयरिंग
•    आउटस्टेशन क्लीयरिंग
•    उसी शाखा में ट्रांसफर
•    हाई वैल्यू क्लीयरिंग

आइए इन बातों को विस्तार से देखें
लोकल क्लीयरिंग
यह तब होती है जब आप उसी शहर की बैंक शाखा में कोई चैक जमा करते हैं। यानी समान शहर में बैंक खाता है तो लोकल क्लीयरिंग होती है।
लोकल चैक की प्रक्रिया इस प्रकार है:
पहला दिन : आप स्थानीय चैक अपने बैंक खाते में लगाते हैं।
दूसरा दिन : आपका बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के क्लीयरिंग हाउस में भेजता है। एक क्लीयरिंग हाउस बैंकों का एक एसोसिएशन है, जिसमें किसी शहर के विभिन्न बैंकों के चैक क्लीयर होते हैं।
क्लीयरिंग हाउस में बैंक चैक बटोरते हैं, जो उनकी किसी भी शाखा से ड्रा किए जाते हैं।
इन बैंकों का मुख्यालय चैक संबंधित शाखाओं को क्लीयरिंग के लिए भेजते हैं। इसे इनवर्ड क्लीयरिंग चैक भी कहा जाता है।
तीसरा दिन :आपके खाते में रकम आती है। अगर ग्राहक के खाते से बैंक रकम आपके खाते में ट्रांसफर करने में (किसी भी कारण से) सफल नहीं हो पाती है तो चैक फिर उसी बैंक के पास आ जाता है, जिसने चैक पेश किया था। (यह वह बैंक है जिसमें आपका खाता है।)
अपने खाते में जमा होने वाला चैक 2-3 दिन में क्रेडिट हो जाता है।

आउटस्टेशन क्लीयरिंग
नाम से ही स्पष्ट है कि आप एक ऐसा चैक जमा करते हैं, जो दूसरे शहर की बैंक शाखा का है। इसमें पहले जैसी ही प्रक्रिया होती है, केवल एक अंतर है। आपके खाते में रकम आने में ज्यादा समय लग जाता है। उसका कारण यह है कि फिजिकल चैक एक शहर से दूसरे शहर जाने में कुछ समय लग जाता है।
सामान्यतः आउटस्टेशन क्लीयरिंग में 7-10 दिन का समय लग जाता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि बैंक ब्रांच कहां है।
उसी शाखा में ट्रांसफर
जिस शाखा में आपका खाता है जब उसी में ड्रा होने वाला चैक लगाया जाता है तो इसमें सबसे कम समय लगता है। उसी दिन आपको अपने खाते में पैसा मिल जाता है।

हाई वैल्यू क्लीयरिंग
एक लाख रुपए या उससे ज्यादा राशि के चैक को हाईवैल्यू कहा जाता है। हाई वैल्यू क्लीयरिंग (एचवीसी) में आपका लोकल चैक उसी दिन क्लीयर हो जाता है। आपके खाते में अगली सुबह ही धन आ जाता है।
इसके लिए आपको सुबह कट आफ टाइम के पहले पैसा जमा करना चाहिए। ध्यान रहे कि चैक की प्रोसेसिंग एचवीसी के तहत हो।
स्मार्ट टिप 1: अपने बैंक की चैक कलेक्शन की नीति देख लें। रिजर्व बैंक के अनुसार सभी बैंकों को इस नीति का पालन करना पड़ता है। यह ग्राहकों को देखना चाहिए कि उनके खाते में रकम आने के लिए निर्धारित समय क्या है।
स्मार्ट टिप 2: आपके बैंक द्वारा लागू आउटस्टेशन क्लीयरिंग और एचवीसी शुल्क देख लें। आउटस्टेशन चैक के मामले में बैंक 15 से 500 रुपए तक वसूलते हैं। यह चैक की रकम और स्थान के हिसाब से लगाया जाता है। रिजर्व बैंक ने इन शुल्कों में कटौती का एक प्रस्ताव तो दिया है। इससे ग्राहकों को फायदा होगा। जहां तक एचवीसी का सवाल है शुल्क 20 से 50 रुपए के बीच लगते हैं। आजकल पढ़ाई के लिए छात्रों के साथ-साथ माता-पिता को भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है। अपने बच्चों के उच्च शिक्षा के सपने को पूरा करने के लिए अभिभावकों को अच्छी खासी रकम की जरुरत होती है। इस काम को आसान करने के लिए बैंकों की तरफ से विद्यार्थियों के लिए एजुकेशन लोन प्रदान किए जाते हैं।

जानिए कि अपने बच्चों के शिक्षा के सपने को पूरा करने के लिए एजूकेशन लोन किस तरह मददगार साबित हो सकता है।


एजूकेशन लोन लेने के लिए सबसे पहले आपको भारतीय नागरिक होना चाहिए। 16-22 साल की आयु वर्ग के छात्र इस लोन को ले सकते हैं। हालांकि आयु के मामले पर अलग-अलग बैंकों का अलग हिसाब होता है। एजूकेशन लोन लेने के लिए विद्यार्थी का शैक्षणिक रिकॉर्ड अच्छा होना चाहिए।

आपके माता-पिता या अभिभावक के पास आय का नियमित स्त्रोत होना चाहिए ताकि जरुरत पड़ने पर वो लोन का भुगतान कर सकें। जिस संस्थान में पढ़ने के लिए आप एजूकेशन लोन मांग रहे हैं वह मान्यता प्राप्त होना चाहिए।

ज्यादातर नाबालिगों को एजूकेशन लोन नहीं मिलता है क्योंकि बैंक ये देखता है कि लोन चुकाने की क्षमता है या नहीं। लेकिन अगर आपके माता-पिता लोन चुकाने में सक्षम हैं तो आपको एजूकेशन लोन मिल सकता है।

एजूकेशन लोन को हासिल करने के लिए आपको एक गारंटर की जरुरूत होगी। अगर आप कर्ज चुकाने में सफल नहीं हो पाते हैं तो गारंटर को स्टूडेंट लोन चुकता करना होगा। ज्यादातर बैंक ऐसे लोगों को गारंटर मानते हैं जिनकी नेटवर्थ या सालाना आय एजूकेशन लोन की कुल पूंजी से ज्यादा हो।

4 लाख रुपये से ज्यादा के एजूकेशन लोन के लिए कोलैट्रल की जरुरत होती है, मसलन जितना लोन होता है उसके अनुपात में थर्ड पार्टी गारंटी की जरुरत हो सकती है। सह-लेनदार (माता-पिता या अभिभवक) को अपने बैंक खातों के स्टेटमेंट, पिछले 2 साल के टैक्स रिटर्न स्टेटमेंट एसेट और देनदारी के स्टेटमेंट और आय प्रमाण पत्र दिखाने पड़ सकते हैं। सामान्य तौर पर बैंक नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट, बॉन्ड, सोना-चांदी, वाहन, घर या प्रॉपर्टी को सिक्योरिटी के रुप में स्वीकार करते हैं।

4 लाख रुपये से लेकर 7.5 लाख रुपये तक के लोन के लिए थर्ड पार्टी गारंटी के रुप में कोलेट्रल की जरुरत हो सकती है। कुछ मामलों में बैंक थर्ड पार्टी गारंटर की बाध्यता समाप्त कर सकता है अगर सह लेनदार (माता-पिता) द्वारा मुहैया कराए गए दस्तावेज से बैंक संतुष्ट होता है।

7.5 लाख रुपये से ज्यादा की रकम के लिए कोलेट्रल के सिक्योरिटी के साथ थर्ड पार्टी गारंटी की जरुरत हो सकती है। इसके साथ ही एक दस्तावेज भी देना होता है जिसमें छात्र के भविष्य की आमदनी जिसके जरिए लोन की किस्तें चुकाई जाएंगी का ब्यौरा होता है।

आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग (कुल पारिवारिक आय सालाना 4.50 लाख रुपये से कम) के लिए मानव संसाधन विभाग की केंद्रीय योजनाओं के तहत कुछ प्रावधान हैं। इसके तहत भारत में तकनीकी और व्यावसायिक कोर्स के लिए एजूकेशन लोन के ब्याज पर सब्सिडी दी जाती है। ये पूंजी एक निश्चित समय के लिए दी जाती है। उदाहरण के लिए कोर्स खत्म होने के एक साल बाद तक या नौकरी मिलने के 6 महीने के भीतर जो भी पहले हो।

जब 1 लाख रुपये से ज्यादा का एजूकेशन लोन हो तो बैंक ज्यादातर उन विद्यार्थियों को लोन देना पसंद करते हैं जिनके पास लोन के बराबर या ज्यादा पूंजी का लाइफ इंश्योरेंस हो। ये एक सुरक्षा फीचर से ज्यादा कुछ नहीं है और इसे सहायक के रुप में भी जाना जा सकता है। अगर लेनदार को कुछ हो जाता है तो बैंक की पूंजी डूबेगी नहीं और इंश्योरेंस पॉलिसी के जरिए बैंक बचे हुए लोन को वसूल सकता है।

कुछ बैंको ने विशेष संस्थानों के खास कोर्स करने के लिए छात्रों को एजूकेशन लोन देने का करार किया है।


क्या एजूकेशन लोन के जरिए सभी खर्चों को कवर किया जाता है

•    कॉलेज, स्कूल, हॉस्टल और टूयूशन फीस का खर्च
•    परीक्षा शुल्क, लाइब्रेरी और लैबोरेटरी शुल्क
•    किताबों, शैक्षणिक उपकरणों और यूनिफार्म का खर्च
•    कॉशन मनी, बिल्डिंग फंड, रिफंडेबल डिपॉजिट इन सभी के साथ संस्थान के बिल और रसीदें की जरुरत होगी
•    छात्र की विदेश यात्रा के लिए ट्रैवल अलाउंस
•    अगर कोर्स पूरा करने के लिए कंप्यूटर खरीदना अनिवार्य हो
•    पढ़ाई पूरी करने के लिए अन्य जरुरी खर्चें जैसे एजूकेशन टूर, थीसिस, प्रोजेक्ट वर्क आदि का खर्च
•    कुछ बैंक छात्र का 50,000 रुपये तक का टू-व्हीलर खर्च भी उठाते हैं


निजी वित्तीय जानकार हर्ष रूंगटा के मुताबिक भारत में शिक्षा सेक्टर के बेहतर भविष्य के लिए एजूकेशन गारंटी फंड बनाना सही कदम होगा। एजूकेशन गारंटी फंड के जरिए शिक्षा सेक्टर को काफी मदद मिल सकती है। इसके अलावा वित्त मंत्रालय को एक एजूकेशन री-फाइनेंस कॉर्पोरेशन बनाने की योजना पर भी ध्यान देना चाहिए। ये मामला 4 साल से लटका हुआ ह