गुरुवार, 5 सितंबर 2013

easy cure for diabetes





















Many people in the world are suffering from Diabetes.

Here is an easy cure for diabetes. Lady finger a natural vegetable which can be used as a cure for diabetes. Instead of painful and expensive treatment available in the market

Lady Finger An Easy Cure For Diabetes
How To Control Diabetes From Lady Finger?
Here is the simple tip to control diabetes from lady finger. Take two or three lady fingers. Cut them from the centre and put them into the glass full with the water. Leave them for the full night. In the morning remove lady finger and drink the water before breakfast. Repeating the same process every day will help you to reduce your sugar level. This simple tips is better than many other painful treatments. Fresh lady finger is better than cooked one.


How Raw Lady Finger Can Help in curing Diabetes?

Low G.I Food:
the word G.I stands for Glycemic index. The person who is suffering from diabetes should take diet enriched in Glycemic index. Approximately 20 G.I is present in okra. That is very low. Diabetic patients can easily use Okra recipes as their meal to fill their stomach and also control their diabetic level.

Fight Kidney Diseases:
lady finger is also good to prevent your body from different kidney diseases. It is considered that high sugar level effect your both kidneys badly. So by taking okra daily will prevent your kidneys. Have an moderate amount of okra daily if you are a diabetic person.

Soluble Fibers:
Soluble fibers are very important to keep your kidneys healthy. They play their role in digestion of carbohydrates. Lady finger is enriched with soluble fibers. It slow down the digestion process and hence lower the sugar level in blood. These are some of the main reasons for you to select lady finger as a diet to control diabetes.

बुधवार, 4 सितंबर 2013

कृष्ण के जन्म लेने की जगह

त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनुज शत्रुघ्न ने लवणासुर नामक राक्षस का वध कर इसकी स्थापना की थी।

द्वापर युग में यहां श्री कृष्ण के जन्म लेने के कारण इस नगर की महिमा और अधिक बढ़ गई है। यहां के मल्लपुरा क्षेत्र के कटरा केशव देव स्थित राजा कंस के कारागार में लगभग पांच हजार दो सौ वर्ष पूर्व भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में रात्रि के ठीक 12 बजे कृष्ण ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया था। यह स्थान उनके जन्म लेने कारण अत्यंत पवित्र माना जाता है |

समय बीतने के साथ कृष्ण के जन्म लेने की जगह और आस पास के क्षेत्र को “कटरा केशवदेव” के नाम से जाना जाने लगा।

पुरातात्विक एंव एतिहासिक सबूत बताते है की कृषण के जन्मस्थान को विभिन्न नामो से जाना जाता था। पुरातत्वविद और तात्कालिक मथुरा के कल्लेक्टर श्री फ स ग्रौजा के अनुसार केवल कटरा केशवदेव और आस पास के इलाके को ही मथुरा के रूप में जाना जाता जाता था। एतिहासिक साहीत्य का अध्यन करने के बाद इतिहासकार कनिहम इस निष्कर्ष पर पहुचे की वहां एक मधु नाम का राजा हुआ जिसके नाम पर उस जगह का नाम मधुपुर पड़ा , जिसे हम आज महोली के नाम से जानते है। राजा की हार के पश्चात् जेल की आस पास की जगह को जिसे हम आज “भूतेश्वर” के नाम से जानते है, को ही मथुरा कहा जाता था। एक अन्य इतिहासकार डॉ वासुदेव शरण अगरवाल ने कटरा केशवदेव को ही कृष्णजन्मभूमि कहा है। इन विभिन्न अध्य्न्नो एंव सबूतों के आधार पर मथुरा के राजनितिक संग्रहालय के दुसरे क्यूरेटर श्रे कृष्णदत्त वाजपेयी ने स्वीकार किया की कटरा केशवदेव ही कृषण की जन्म भूमि है।

पुरातात्विक सबूत एंव हमलों का इतिहास

प्रथम मन्दिर

पुरातात्विक विश्लेषणों, पुरातात्विक पत्थरों के टुकडो के अध्यन एंव विदेशी यात्रियों की लेखनियो से स्पष्ट होता है की इस स्थान पर समय समय पर कई बार भव्य मंदिर बनाये गए। सबूत बताते है की कंस की जेल के स्थान पर पहला मंदिर, जहाँ कृषण का जन्म हुआ था, कृषण के पडपोते “ब्रजनाभ ” ने बनवाया था।

ईसवी सन् से पूर्ववर्ती 80-57 के महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिला लेख से ज्ञात होता है जो कि ब्राह्मी लिपि में पत्थरों पर लिखे गए के “महाभाषा षोडश” के अनुसार वासु नाम के एक व्यक्ति ने श्री कृषण के जन्म स्थान पर बलि वेदी का निर्माण करवाया।

द्वितीय मन्दिर

दूसरा मन्दिर विक्रमादित्य के काल में सन् 800 ई॰ के लगभग बनवाया गया था। संस्कृति और कला की दृष्टि से उस समय मथुरा नगरी बड़े उत्कर्ष पर थी। हिन्दू धर्म के साथ बौद्ध और जैन धर्म भी उन्नति पर थे। श्रीकृष्ण जन्मस्थान के संमीप ही जैनियों और बौद्धों के विहार और मन्दिर बने थे। यह मन्दिर सन 1017-18 ई॰ में महमूद ग़ज़नवी के कोप का भाजन बना। इस भव्य सांस्कृतिक नगरी की सुरक्षा की कोई उचित व्यवस्था न होने से महमूद ने इसे ख़ूब लूटा। भगवान केशवदेव का मन्दिर भी तोड़ डाला गया।

मीर मुंशी अल उताबी, जो की गजनी का सिपहसलार था ने तारीख-इ-यमिनी में लिखा है की:

” शहर के बीचो बिच एक भव्य मंदिर मोजूद है जिसे देखने पर लगता है की इसका निर्माण फरिश्तो ने कराया होगा। इस मंदिर का वर्णन शब्दों एंव चित्रों में करना नामुमकिन है। सुल्तान खुद कहते है की अगर कोई इस भव्य मंदिर को बनाना चाहे तो कम से कम १० करोड़ दीनार और २०० साल लगेंगे। “

मीर मुंशी तो संघी नहीं था। संघ की बाते तो तुम्हे इतिहास का भगवाकरण लगता है। मीर मुंशी के लिखे हुए इतिहास का क्या कहोगे?

हालाँकि गजनी ने इस भव्य मंदिर को अपने गुस्से की आग में आकर ध्वस्त कर दिया। स्थानीय निवासियों का कत्ले आम किया और युवतियों को उठाकर साथ ले गया। और मोती लाल का नमूना नेहरु अपनी किताब “भारत की खोज” में गजनी को बहुत बड़ा वास्तु कला का प्रेमी बताता है, जिसने अव्यवस्थित मथुरा को तौड़ कर उसका कलात्मक निर्माण कराया। ये है नेहरु और कांग्रेसियों का सुनेहरा इतिहास।

तृतीय मन्दिर

संस्कृत के एक शिला लेख से ज्ञात होता है कि महाराजा विजयपाल देव जब मथुरा के शासक थे, तब सन 1150 ई॰ में जज्ज नामक किसी व्यक्ति ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर एक नया मन्दिर बनवाया था। यह विशाल एवं भव्य बताया जाता हैं। कटरा केशवदेव के पत्थरों पर संस्क्रत भाषा में लिखे गए सबूतों से स्पष्ट होता है की मुस्लिम शासको की नजरो में यह मंदिर तबाही का लक्ष्य बन गया था। सिकंदर लोदी के शासन के दौरान कृष्ण जनम भूमि मंदिर एक बार पुनः तोडा गया।

चतुर्थ मन्दिर

मुग़ल बादशाह जहाँगीर के शासन काल में श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर पुन: एक नया विशाल मन्दिर निर्माण कराया गया। ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जू देव बुन्देला ने इसकी ऊँचाई 250 फीट रखी गई थी। यह आगरा से दिखाई देता बताया जाता है।

मुस्लिम शासको की बुरी नजर से मंदिर की रक्षा करने के लिए इसके आस पास एक ऊँची दिवार बनाने का भी आदेश दिया। जिसके अवशेष हम आज भी मंदिर के आस पास देख सकते है।

औरेंग्ज़ेब द्वारा विशाल मंदिर का विनाश

फ्रांस एंव इटली से आये विदेशी यात्रियों ने इस मंदिर की व्याख्या अपनी लेखनियो में सुरुचिपूर्ण और वास्तुशास्त्र के एक अतुल्य एंव अदभुत कीर्तिमान के रूप में की। वो आगे लिखते है की:

“इस मंदिर की बाहरी त्वचा सोने से ढकी हुई थी और यह इतना ऊँचा था की ३६ मिल दूर आगरा से भी दिखाई देता था। इस मंदिर की हिन्दू समाज में ख्याति देखकर औरंगजेब नाराज हो गया जिसके कारण उसने सन १६६९ में इस मंदिर को तुडवा दिया। वह इस मंदिर से इतना चिड़ा हुआ है की उसने मंदिर से प्राप्त अवशेषों से अपने लिए एक विशाल कुर्सी बनाने का आदेश दिया है। उसने कृषण जन्मभूमि पर ईदगाह बनाने का भी आदेश दिया है “

शुक्र है उपरोक्त कथन विदेशियों ने लिखे। अगर ये सब किसी हिन्दू ने लिखा होता तो उसे भी किवंदती कहकर रानी पद्मावती की तरह नकार दिया जाता। में यहाँ विदेशी और मुसलमानों के लेखो का उदाहरन इसीलिए दे रहा हु क्योंकि हिन्दू के द्वारा लिखे गए इतिहास को तो हमारे देश के सेकुलरिस्ट मानते ही नहीं।

औरंगजेब को उसके इस दुष्कर्म की सजा मिली। मंदिर तुडवाने के बाद वह कभी सुखी नहीं रह सका और अपने दक्षिण के अभियान से जिन्दा नहीं लौट सका। केवल उसके बेटे ही उसके विरुद्ध नहीं खड़े हुए बल्कि वे ईदगाह की भी रक्षा नहीं कर सके। और आख़िरकार आगरा और मथुरा पर मराठा साम्राज्य का अधीकार हो गया।

इसके बाद का इतिहास -

मराठो ने कटरा केशवदेव को ईदगाह समेत अधिकार मुक्त घोषित कर दिया। ये हे हिन्दुओ का सच। एक तरफ आप पाएंगे की जिस किसी भी मुस्लिम आक्रान्ता का मथुरा पर कब्ज़ा हुआ उसने मंदिर तोड़ने का नया कीर्तिमान बनाया। चाहे वह गजनी हो लोधी हो या ओरंगजेब। मगर जब हिन्दू मराठो का मथुरा पर कब्ज़ा हुआ तो मस्जिद तोड़ने की बात तो दूर उन्होंने मंदिर भी नहीं बनाया। जहा भगवन श्रीक्रष्ण का जनम हुआ था।

सन १८०२ में लोर्ड लेक ने मराठो पर जीत हासिल की और मथुरा एंव आगरा इस्ट इंडिया कंपनी के अधीन चले गए। इस्ट इंडिया कम्पनी ने भी इसे अधिकार मुक्त ही माना। सन १८१५ में इस्ट इंडिया कम्पनी ने कटरा केशवदेव के १३.३७ एकड़ के हिस्से की नीलामी की घोषणा की। जिसे काशी नरेश पत्निमल ने खरीद लिया।

इस खरीदी हुई जमीन पर राजा पत्निमल एक भव्य कृषण मंदिर बनाना चाहते थे। किन्तु मुसलमानों ने इसका यह कह कर विरोध किया की नीलामी केवल कटरा केशवदेव के लिए थी ईदगाह के लिए नहीं।


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विवाद - जैसा की सर्वविदित है की किस तरह मंदिर को तोड़ कर उसपे अवैध निर्माण किया गया उसपे कोई भी विवाद और दावे करना सामाजिक रूप से कितना गलत है फिर भी हिन्दूओ की इस सहिष्‍णुता से मैं स्‍तभ्भित हूं साथ इससे मुझे अपार पीड़ा भी हुई है। और मुस्लिम समाज तो है ही शांतप्रिय अमन पसंद | उनको कुछ कहना भावनाए आहत करना और साम्प्रदायिकता फैलाना है |
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क़ानूनी मामले -

ब्रिटिश शासन से अब तक कुल 6 बार मुस्लिम मुकदमा हारे और क़ानूनी तौर पर पूरा कटरा केशवदेव के १३.३७ एकड़ हिन्दुओं का है फिर भी .........

1 - सन १८७८ में मुसलमानों ने पहली बार एक मुकदमा दर्ज कराया।

मुसलमानों ने दावा किया की कटरा केशवदेव ईदगाह की सम्पति है और ईदगाह का निर्माण औरंगजेब ने कराया था इसलिए इस पर मुसलमानों का अधिकार है। इसके लिए मथुरा से प्रमाण मांगे गए।

तत्कालिक मथुरा कलेक्टर मिस्टर टेलर ने मुसलमानों के दावे को ख़ारिज करते हुए कहा की यह क्षेत्र मराठो के समय से स्वतंत्र है। जो की इस्ट इंडिया कम्पनी ने भी स्वीकार किया। जिसे सन १८१५ में काशी नरेश पत्निमल ने नीलामी में खरीद लिया। उन्होंने अपने आदेश में आगे जोड़ते हुए कहा की राजा पत्निमल ही कटरा केशवदेव, ईदगाह और आस पास के अन्य निर्माणों के मालिक है।

2 - दूसरी बार यार मुकदमा मथुरा के न्यायधीश एंथोनी की अदालत में अहमद शाह बनाम गोपी ई पि सी धारा ४४७/३५२ के रूप में दाखिल हुआ।

अहमद शाह ने आरोप लगाया की ईदगाह का चोकीदार गोपी कटरा केशवदेव के पश्चिमी हिस्से में एक सड़क का निर्माण करा रहा है। जबकि यह हिस्सा ईदगाह की संपत्ति है। अमहद शाह ने चोकीदार गोपी को सड़क बनाने से रोक दिया।

इस मुक़दमे का निर्णय सुनाते हुए न्यायधीश ने कहा की सड़क एंव विवादित जमीन पत्निमल परिवार की संपत्ति है। तथा अहमद शाह द्वारा लगाये गए आरोप झूठे है।

3 - तीसरा मुकदमा सन १९२० में आगरा जिला न्यायलय में दाखिल किया गया।

इस मुक़दमे में मथुरा के न्यायधीश हूपर के निर्णय को चुनोती दी गयी थी। (अपील संख्या २३६ (१९२१) एंव २७६(१९२०)) । इस मुक़दमे का निर्णय सुनाते हुए पुनः न्यायलय ने आदेश दिया की विवादित जमीन इस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजा पत्निमल को बेचीं गयी थी जिसका भुगतान भी वो ११४० रूपये के रूप में कर चुके है। इसलिए विवादित जमीन पर ईदगाह का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि ईदगाह खुद राजा पत्निमल की संपत्ति है।

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पुरे क्षेत्र पर हिन्दू अधिकारों की घोषणा
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4 - सन १९२८ में मुसलमानों ने ईदगाह की मरम्मत की कोशिश की। जिसके कारण फिर यह मुकदमा अदालत में चला गया।

पुनः न्यायधीश बिशन नारायण तनखा ने फैसला सुनाते हुए कहा की कटरा केशवदेव राजा पत्निमल के उत्तराधिकारियो की संपत्ति है। मुसलमानों का इस पर कोई अधिकार नहीं है इसलिए ईदगाह की मरम्मत को रोका जाता है।

सन १९४४ में महामना मदन मोहन मालवीय जी की प्रेरणा से श्री जुगल किशोर बिरला जी ने सम्मसत क्षेत्र १३४०० रुपए में खरीद लिया और हनुमान प्रसाद पोतदार, भिकामल अतरिया एंव मालवीय जी के साथ मिल कर एक ट्रस्ट बनाया।

5 - सन १९४६ में मुकदमा फिर अदालत में गया। इस बार भी अदालत ने कटरा केशवदेव पर राजा पत्निमल के वंशजो का अधिकार बताया जो अब श्रीकृषण जन्मभूमि ट्रस्ट की संपत्ति है। क्योकि इसे राजा पत्निमल के वंशजो ने इस ट्रस्ट तो बेच दिया था।

6 - और अंतिम बार १९६० में पुनः न्यायलय ने आदेश देते हुआ कहा की:

“मथुरा नगर पालिका के बही खातो तथा दसरे सबूतों का अध्यन करने से यह स्पष्ट होता है की कटरा केशवदेव जिसमे ईदगाह भी शामिल है का लैंड टैक्स श्रीकृष्ण जन्मभूमि संस्था द्वारा ही दिया जाता है। इससे यह साबित होता है की विवादित जमीन पर केवल इसी ट्रस्ट का अधिकार है”।

इस तरह एक बार नहीं पुरे छ: बार अदालतों ने मथुरा पर हिन्दुओ का अधिकार स्वीकार किया। ये हे मथुरा की सच्चाई, क्या इस देश के तथाकथित सेकुलरिस्ट अदालत का निर्णय लागु करेंगे।

नहीं कभी नहीं कराएँगे।

क्योकि मथुरा में अगर मंदिर निर्माण हो गया तो ये फिर मुसलमानों के पास वोटो की भीख मांगने कैसे जायेंगे।

अयोध्या हो मथुरा हो या काशी, ये सभी तीर्थ जभी स्वतंत्र हो सकते है जब हिन्दू संगठित होंगे। इस देश में ३० % मुस्लमान हे। और इन ३० % मुसलमानों ने पुरे देश की राजनीती को अपना गुलाम बना रखा है। क्योकि ये संगठित है।

जबकि देश में 65 % हिन्दुओ के होते हुए भी उन्हें कोई पूछने वाला नहीं है, क्योकि वे असंगठित है। अगर इस देश की राजनितिक चाल को बदलना है तो इसके लिए राजनीती का हिन्दुकरण और हिन्दुओ का सैनिकीकरण अतिआवश्यक है।

स्वामी विवेकानंद: “इसाई मिशनरी अपने धर्म प्रचार में हिन्दू धरम के विरुद्ध तरह तरह की गन्दी बाते और कुत्सित प्रचार करते है, लेकिन इस्लाम के संबंध में उन्हें कुछ कहने की हिम्मत नहीं, क्योंकि वहां सीधे चमकती तलवारे खिंच जायेंगी। "

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जन्मस्थान का पुनरुद्वार
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सन 1940 के आसपास की बात है कि महामना पण्डित मदनमोहन जी का भक्ति-विभोर हृदय उपेक्षित श्रीकृष्ण जन्मस्थान के खण्डहरों को देखकर द्रवित हो उठा। उन्होंने इसके पुनरूद्वार का संकल्प लिया।

उसी समय सन् 1943 के लगभग ही स्वर्गीय श्री जुगलकिशोर जी बिड़ला मथुरा पधारे और श्रीकृष्ण जन्म स्थान की ऐतिहासिक वन्दनीय भूमि के दर्शनार्थ गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने जो दृश्य देखा उससे उनका हृदय उत्यन्त दु:खित हुआ।

महामना पण्डित मदनमोहन जी मालवीय ने इधर श्री जुगलकिशोर जी बिड़ला को श्रीकृष्ण-जन्मस्थान की दुर्दशा के सम्बन्ध में पत्र लिखा और उधर श्रीबिड़ला जी ने उनको अपने हृदय की व्यथा लिख भेजी। उसी के फलस्वरूप श्री कृष्ण जन्मस्थान के पुनरूद्वार के मनोरथ का उदय हुआ।

इसके फलस्वरूप धर्मप्राण श्री जुगल किशोर जी बिड़ला ने 07 फ़रवरी 1944 को कटरा केशव देव को राजा पटनीमल के तत्कालीन उत्तराधिकारियों से खदीद लिया, परन्तु मालवीय जी ने पुनरूद्धार की योजना बनाई थी वह उनके जीवनकाल में पूरी न हो सकी। उनकी अन्तिम इच्छा के अनुसार श्री बिड़ला जी ने 21 फ़रवरी 1951 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रष्ट के नाम से एक ट्रष्ट स्थापित किया।

जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना 1951 में हुई थी परन्तु उस समय मुसलमानों की ओर से 1945 में किया हुआ एक मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में निर्णयाधीन था इसलिए ट्रस्ट द्वारा जन्मस्थान पर कोई कार्य 7 जनवरी 1953 से पहले-जब मुक्दक़मा ख़ारिज हो गया-न किया जा सका।

उपेक्षित अवस्था में पड़े रहने के कारण उसकी दशा अत्यन्त दयनीय थी। कटरा के पूरब की ओर का भाग सन् 1885 के लगभग तोड़कर बृन्दावन रेलवे लाइन निकाली जा चुकी थी। बाक़ी तीन ओर के परकोटा की दीवारें और उससे लगी हुई कोठरियाँ जगह-जगह गिर गयी थीं और उनका मलबा सब ओर फैला पड़ा था। कृष्ण चबूतरा का खण्डहर भी विध्वंस किये हुए मन्दिर की महानता के द्योतक के रूप में खड़ा था।

चबूतरा पूरब-पश्चिम लम्बाई में 170 फीट और उत्तर-दक्खिन चौड़ाई में 66 फीट है। इसके तीनों ओर 16-16 फीट चौड़ा पुश्ता था जिसे सिकन्दर लोदी से पहले कुर्सी की सीध में राजा वीरसिंह देव ने बढ़ाकर परिक्रमा पथ का काम देने के लिये बनवाया था। यह पुश्ता भी खण्डहर हो चुका था। इससे क़रीब दस फीट नीची गुप्त कालीन मन्दिर की कुर्सी है जिसके किनारों पर पानी से अंकित पत्थर लगे हुए हैं।

उत्तर की ओर एक बहुत बड़ा गढ्डा था जो पोखर के रूप में था। समस्त भूमि का दुरूपयोग होता था, मस्जिद के आस-पास घोसियों की बसावट थी जो कि आरम्भ से ही विरोध करते रहे हैं।

अदालत दीवानी, फ़ौजदारी, माल, कस्टोडियन व हाईकोर्ट सभी न्यायालयों में एवं नगरपालिका में उनके चलायें हुए मुक़दमों में अपने सत्व एवं अधिकारों की पुष्टि व रक्षा के लिए बहुत कुछ व्यय व परिश्रम करना पड़ा। सभी मुक़दमों के निर्णय जन्मभूमि-ट्रस्ट के पक्ष में हुए।

मथुरा के प्रसिद्ध वेदपाठी ब्राह्मणों द्वारा हवन-पूजन के पश्चात श्री स्वामी अखंडानन्द जी महाराज ने सर्वप्रथम श्रमदान का श्रीगणेश किया और भूमि की स्वच्छता का पुनीत कार्य आरम्भ हुआ।

दो वर्ष तक नगर के कुछ स्थानीय युवकों ने अत्यन्त प्रेम और उत्साह से श्रमदान द्वारा उत्तर ओर के ऊँचे-ऊँचे टीलों को खोदकर बड़े गड्डे को भर दिया और बहुत सी भूमि समतल कर दी। कुछ विद्यालयों के छात्रो ने भी सहयोग दिया। इन्हीं दिनों उत्तर ओर की प्राचीर की टूटी हुई दीवार भी श्री डालमियाँ जी के दस हज़ार रुपये के सहयोग से बनवा दी गयी।

भूमि के कुछ भाग के स्वच्छ और समतल हो जाने पर भगवान कृष्ण के दर्शन एवं पूजन-अर्चन के लिए एक सुन्दर मन्दिर का निर्माण डालमिया-जैन ट्रस्ट के दान से सेठ श्रीरामकृष्ण जी डालमिया की स्वर्गीया पूज्या माताजी की पुण्यस्मृति में किया गया।

मन्दिर में भगवान के बल-विग्रह की स्थापना, जिसको श्री जुगल किशोर बिड़ला जी ने भेंट किया था, आषाढ़ शुक्ला द्वितीय सम्वत् 2014 दिनांक 29 जून सन् 1957 को हुई, और इसका उद्-घाटन भाद्रपद कृष्ण 8 सम्वत् 2015 दिनांक 6 सितंबर सन् 1958 को 'कल्याण' (गीता प्रेस) के यशस्वी सम्पादक संतप्रवर श्रीहनुमान प्रसाद पोद्दार के कर-कमलों द्वारा हुआ।

उसके बाद यहां भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। भागवत भवन यहां का प्रमुख आकर्षण है। यहां पांच मंदिर हैं जिनमें राधा-कृष्ण का मंदिर मुख्य है। मथुरा का अन्य आकर्षण असिकुंडा बाजार स्थित ठाकुर द्वारिकाधीश महाराज का मंदिर है। यहां वल्लभ कुल की पूजा-पद्धति से ठाकुरजी की अष्टयाम सेवा-पूजा होती है। देश के सबसे बड़े व अत्यंत मूल्यवान हिंडोले द्वारिकाधीश मंदिर के ही है जोकि सोने व चांदी के है। यहां श्रावण माह में सजने वाली लाल गुलाबी, काली व लहरिया आदि घटाएं विश्व प्रसिद्ध हैं।

मथुरा में यमुना के प्राचीन घाटों की संख्या 25 है। उन्हीं सब के बीचों-बीच स्थित है- विश्राम घाट। यहां प्रात: व सांय यमुनाजी की आरती उतारी जाती है। यहां पर यमुना महारानी व उनके भाई यमराज का मंदिर भी मौजूद है। विश्राम के घाट के सामने ही यमुना पार महर्षि दुर्वासा का आश्रम है।

इसके अलावा मथुरा में भूतेश्वर महादेव, धु्रव टीला, कंस किला, अम्बरीथ टीला, कंस वध स्थल, पिप्लेश्वर महादेव, बटुक भैरव, कंस का अखाड़ा, पोतरा कुंड, गोकर्ण महादेव, बल्लभद्र कुंड, महाविद्या देवी मंदिर आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल है।

राणा की संतानों जागो,

राणा की संतानों जागो, जागो वीर शिवा के लालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥

शत-शत आघातों को सहकर माता घायल आज पड़ी है,
विश्व गुरु, सोने की चिड़िया शत्रु सैन्य से आज घिरी है।
घिरी हुई है जौहर ज्वाला, घिरी हुई है गंगा धारा,
घिरा हुआ है आज हिमालय, और घिरा है मधुबन प्यारा,
देखो ना अंधियारा छाए, जागो ओ सूरज के लालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥

स्वप्न हमारे बंट सकते हैं, पर ममता कैसे बंट जाए?
एक दीप तो बुझ सकता है, राष्ट्रज्वाल कैसे बुझ पाए??
भ्रमित हमें सब कर सकते हैं, मगर सत्य को कौन मिटाए?
छाती चीरी जा सकती है, प्यार मचलता कौन मिटाए??
माँ का प्यार न कभी भुलाना, जागो ओ भारत के बालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥

पाश्चात्य की चकाचौंध में चुंधिया गयी तुम्हारी आँखें,
अब तो अपनी आँखे खोलो, बुला रही है माँ की आहें।
बुला रहा है नाद त्राहि का, बुला रही है आहत वसुधा,
बुला रही है भगवत-गीता, और बुलाती प्यासी गंगा।
भारत माँ की प्यास बुझाने, आ जाओ अमृत के प्यालों।
फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥......

संस्कार नहीं बदल सकते

संस्कार नहीं बदल सकते

किसी वन में एक सिंह अपनी पत्नी के साथ रहा करता था। एक बार सिंही ने दो पुत्रों को जन्म दिया। सिंह वन में जाकर भांति-भांति के पशुओं को मारकर अपनी पत्नी के लिए लाया करता था। किन्तु एक दिन की बात है कि दिन भर घूमने पर भी सिंह को कोई शिकार हाथ नहीं लगा।

इसी निराशा में वह घर वापस आ रहा था कि मार्ग में उसको एक सियार का बच्चा मिल गया। सिंह ने उसे उठाया और जीवित अवस्था में ही घर लाकर उसको अपनी पत्नी को सौंप दिया। सिंही ने पूछा, “आज भोजन के लिए कुछ नहीं मिला?”

“नहीं, इसके अतिरिक्त कुछ मिला ही नहीं। इसको भी शिशु समझकर मैंने मारा नहीं। क्योंकि कहा गया है कि प्राण पर संकट आने पर भी बालक की हत्या नहीं करनी चाहिए। अब तुम तो भूखी हो इस समय इसका ही आहार कर लो।”

शेरनी बोली, “जब बालक समझकर तुमने नहीं मारा तो मां होकर अपने पेट के लिए मैं इसकी हत्या क्यों करूं? प्राण जाने पर भी मनुष्य को किसी प्रकार का अकृत्य नहीं करना चाहिए। आज से यह मेरा तृतीय पुत्र है।”

उस दिन से उस सिंही ने उस सियार के शिशु को भी अपने शिशुओं की ही भांति अपना दूध पिलाना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार वह सियार शिशु सिंह-शिशुओं के साथ आहार-विहार करता हुआ आनन्द से दिन बिताने लगा। कुछ दिनों बाद एक जंगली हाथी उस वन में भटकता हुआ आ निकला।

उसको देखकर सिंह के दोनों शिशु उस पर क्रुद्ध होकर उसकी और दौड़ पड़े। उनको जाते देखकर उस सियार ने अपने सिंह भाइयों से कहा, “यह तो हाथी है! हाथी सिंह-कुल का स्वाभाविक शत्रु होता है, उसकी और नहीं जाना चाहिए।”

यह कहकर वह घर की ओर भाग गया। उसको भागता देखकर सिंह-शिशु भी निरुत्साहित होकर घर को लौट आए। किसी ने ठीक ही कहा है कि यदि युद्धभूमि से एक भी कायर भागने लगता है तो शेष सेना का भी उत्साह क्षीण हो जाता है।

घर पहुंचकर दोनों सिंह-शिशुओं ने सियार के हाथी को देखकर भाग आने की बात का उपहास किया। इससे सियार के बच्चे को क्रोध आ गया और उसने क्रोध में उनको भला-बुरा कहा। उसे क्रोधित देख, एकान्त में जाकर सिंही ने कहा, “बेटे! वे दोनों तुम्हारे छोटे भाई हैं। तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए।” सियार का क्रोध शान्त नहीं हुआ। वह कहने लगा, “मैं क्या इनसे कम हूं। मैं इनको अपमान का मजा चखाऊंगा।”

सिंही बोली, “हां बेटे! तुम कहते हो ठीक हो। तुम वीर हो, तुम विद्वान हो और तुम दर्शनीय भी हो। किन्तु जिस कुल में तुम उत्पन्न हुए हो उस कुल में हाथी का शिकार नहीं किया जाता।” “अब तुमने क्रोध कर ही लिया है तो मैं तुम्हें बताती हूं। तुम सियार हो, मैंने तुम्हें अपना दूध पिलाकर पालन-पोषण” किया है।

मेरे ये दोनों शिशु जब तक यह नहीं जानते कि तुम सिंह नहीं सियार हो, तब तक ही तुम्हारी कुशल है। इसलिए अच्छा यही है कि तुम अभी चुपचाप यहां से खिसक जाओ, अन्यथा यदि किसी दिन इनको पता लग गया तो ये तुमको मारे बिना नहीं छोड़ेंगे।”

सिंही की बात सुनकर सियार का बच्चा भय से कांप उठा। वह चुपचाप वहां से खिसककर, किसी प्रकार अपनी जान बचा अपने जातियों में जाकर मिल गया। इसलिए कहते हैं अपनी जात-बिरादरी के साथ ही रहना चाहिए, क्योंकि हम अपने स्वभाव नहीं बदल सकते।

हवन तथा अग्निहोत्र महत्व



















क्या आप जानते हैं कि ..... हमारे हिन्दू सनातन धर्म में .... यज्ञ... हवन तथा अग्निहोत्र को इतना महत्व क्यों दिया गया है .... एवं, यज्ञों का वैज्ञानिक महत्व क्या है ....?????

दरअसल ... यज्ञों की धार्मिक से ज्यादा वैज्ञानिक महत्व के कारण ही.... हमारे लगभग हर धर्मग्रन्थ में.... यज्ञों को इतना महत्व दिया गया है...!

परन्तु , दुर्भाग्य से .... हिन्दू सनातन धर्म में सर्वोच्च स्थान पर विराजमान यह हवन .....आज प्रायः एक आम आदमी से दूर है.......।

साथ ही आज इसे केवल कुछ वर्ग, जाति और धर्म तक सीमित कर दिया गया है..........।

और, हद तो यह है कि...... आज कोई यज्ञ पर प्रश्न कर रहा है....तो , कोई मजाक.......।

यहाँ तक कि..... ""गयासुद्दीन काजी के पोते"" ने भी एक बार यज्ञ के बारे में कहा था कि..... यज्ञ सिर्फ .. समय और धन की बर्बादी है....!

इसीलिए..... मेरे इस लेख का उद्देश्य जनमानस को यह याद दिलाना है कि....... हवन क्यों इतना पवित्र है......... और, क्यों यज्ञ करना न सिर्फ हर इंसान का अधिकार है ....बल्कि, कर्त्तव्य भी है....!

यह लेख 100 करोड़ हिंदुओं के लिए नहीं है.... बल्कि, यह लेख दुनिया के 7 अरब मनुष्यों के भलाई से सम्बंधित है.....!

अगर हम यज्ञ और हवन.... से सम्बंधित आस्था की बात करें तो.....

हिंदू धर्म में सर्वोपरि पूजनीय वेदों और ब्राह्मण ग्रंथों में यज्ञ/हवन की क्या महिमा है........उसकी कुछ झलक इन मन्त्रों में मिलती है-

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्. होतारं रत्नधातमम्........ [ ऋग्वेद 1/1/1/]

समिधाग्निं दुवस्यत घृतैः बोधयतातिथिं. आस्मिन् हव्या जुहोतन. ........[यजुर्वेद 3/1]

अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे......... [यजुर्वेद 22/17]

सायंसायं गृहपतिर्नो अग्निः प्रातः प्रातः सौमनस्य दाता.......... [अथर्ववेद 19/7/3]

प्रातः प्रातः गृहपतिर्नो अग्निः सायं सायं सौमनस्य दाता. .........[अथर्ववेद 19/7/4]

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः .........[यजुर्वेद 31/9]

अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोधि ब्रुवन्तु तेवन्त्वस्मान ..........[यजुर्वेद 19/58]

यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म ...........[शतपथ ब्राह्मण 1/7/1/5]

यज्ञो हि श्रेष्ठतमं कर्म ............[तैत्तिरीय 3/2/1/4]

यज्ञो अपि तस्यै जनतायै कल्पते, यत्रैवं विद्वान होता भवति [ऐतरेय ब्राह्मण १/२/१]

यदैवतः स यज्ञो वा यज्याङ्गं वा.. [निरुक्त ७/४]

इन मन्त्रों में निहित अर्थ और प्रार्थनाओं के अर्थ कुछ इस प्रकार से है कि....
यज्ञ/हवन से सम्बंधित कुछ मन्त्रों के भाव सरल शब्दों में कुछ ऐसे हैं

- इस सृष्टि को रच कर जैसे ईश्वर हवन कर रहा है वैसे मैं भी करता हूँ.

- यह यज्ञ धनों का देने वाला है, इसे प्रतिदिन भक्ति से करो, उन्नति करो.

- हर दिन इस पवित्र अग्नि का आधान मेरे संकल्प को बढाता है.

- मैं इस हवन कुंड की अग्नि में अपने पाप और दुःख फूंक डालता हूँ.

- इस अग्नि की ज्वाला के समान सदा ऊपर को उठता हूँ.

- इस अग्नि के समान स्वतन्त्र विचरता हूँ, कोई मुझे बाँध नहीं सकता.

- अग्नि के तेज से मेरा मुखमंडल चमक उठा है, यह दिव्य तेज है.

- हवन कुंड की यह अग्नि मेरी रक्षा करती है.

- यज्ञ की इस अग्नि ने मेरी नसों में जान डाल दी है.

- एक हाथ से यज्ञ करता हूँ, दूसरे से सफलता ग्रहण करता हूँ.

- हवन के ये दिव्य मन्त्र मेरी जीत की घोषणा हैं.

- मेरा जीवन हवन कुंड की अग्नि है, कर्मों की आहुति से इसे और प्रचंड करता हूँ.

- प्रज्ज्वलित हुई हे हवन की अग्नि! तू मोक्ष के मार्ग में पहला पग है.

- यह अग्नि मेरा संकल्प है. हार और दुर्भाग्य इस हवन कुंड में राख बने पड़े हैं.

- हे सर्वत्र फैलती हवन की अग्नि! मेरी प्रसिद्धि का समाचार जन जन तक पहुँचा दे!

- इस हवन की अग्नि को मैंने हृदय में धारण किया है, अब कोई अँधेरा नहीं.

- यज्ञ और अशुभ वैसे ही हैं जैसे प्रकाश और अँधेरा. दोनों एक साथ नहीं रह सकते.

- भाग्य कर्म से बनते हैं और कर्म यज्ञ से. यज्ञ कर और भाग्य चमका ले!

- इस यज्ञ की अग्नि की रगड़ से बुद्धियाँ प्रज्ज्वलित हो उठती हैं.

- यह ऊपर को उठती अग्नि मुझे भी उठाती है.

- हे अग्नि! तू मेरे प्रिय जनों की रक्षा कर!

- हे अग्नि! तू मुझे प्रेम करने वाला साथी दे. शुभ गुणों से युक्त संतान दे!

- हे अग्नि! तू समस्त रोगों को जड़ से काट दे!

- अब यह हवन की अग्नि मेरे सीने में धधकती है, यह कभी नहीं बुझ सकती.

- नया दिन, नयी अग्नि और नयी जीत.

परन्तु..... इन मन्त्रों का निचोड़ यह है कि....... हवन/यज्ञ संसार का सर्वोत्तम कर्म और....पवित्र कर्म है जिसके करने से सुख ही सुख बरसता है.

सिर्फ इतना ही नहीं , भगवान श्रीराम को रामायण में ........ स्थान स्थान पर ‘यज्ञ करने वाला’ कहा गया है. ..... और, महाभारत में भी श्रीकृष्ण सब कुछ छोड़ सकते हैं.... पर, हवन नहीं छोड़ सकते.

महाभारत पढने वाले लोगों को यह भली-भांति याद होगा कि......हस्तिनापुर जाने के लिए भगवान् श्री कृष्ण... अपने रथ पर निकल पड़ते हैं... लेकिन, जब रास्ते में ही शाम हो जाती है तो ... वे रथ रोक कर हवन करते हैं.

और, अगले दिन कौरवों की राजसभा में हुंकार भरने से पहले अपनी कुटी में हवन करते हैं.......

यहाँ तक कि..... अभिमन्यु के बलिदान जैसी भीषण घटना होने पर भी सबको साथ लेकर पहले यज्ञ करते हैं....

इस तरह.... श्रीकृष्ण के जीवन का एक एक क्षण जैसे आने वाले युगों को यह सन्देश दे रहा था कि........... चाहे कुछ हो जाए, यज्ञ करना कभी न छोड़ना.

इस तरह.... जिस कर्म को भगवान स्वयं श्रेष्ठतम कर्म कहकर करने का आदेश दें......... वो कर्म कर्म नहीं धर्म है......... उसका न करना अधर्म है.

यही कारण है कि..... जब हिन्दुओं में किसी का जन्म होता है तो.... तो वहां हवन होता है ..... पहली बार केश कटे (मुंडन) तो हवन हुआ. ..... नामकरण होता है तो हवन हवन किया जाता है... !

जन्मदिन , गृह प्रवेश , मेरे व्यवसाय का आरम्भ , शादी , बच्चे , संकट , खुशियाँ . ..... हर काम में हवन किया जाता है...!

अगर दूसरे शब्दों में कहूँ तो..... हर बड़ा काम करने से पहले हवन किया जाता है ..... क्योंकि, एक आस्था है कि ...... हवन कर लूँगा.... तो , भगवान साथ होंगे.... या फिर, मैं कहीं भी रहूँगा, भगवान साथ होंगे. और, इस जीवन की अग्नि में सारे पाप जलकर स्वाहा होंगे तथा मेरे सत्कर्मों की सुगंधि सब दिशाओं में फैलेगी.

दरअसल..... हमारे ऋषि-मुनियों ने हवन के वैज्ञानिक महत्व को लाखों -करोड़ों साल पहले ही समझ लिया था...!

परन्तु... आप यह जानकर आश्चर्यचकित हो जायेंगे कि...... आस्था और भक्ति के प्रतीक हवन को करने के विचार मन में आते ही .......आत्मा में उमड़ने वाला ईश्वर प्रेम वैसा ही है ... जैसे एक माँ के लिए.. उसके गर्भस्थ अजन्मे बच्चे के प्रति भाव..... जिसे कभी ना तो देखा..... न सुना.......... फिर भी उसके साथ एक कभी न टूटने वाला रिश्ता बन जाता है .

इस तरह की मानसिक आनंद की जो अवस्था एक माँ की होती है....... कतिपय वही अवस्था एक भक्त की होती है....... जो वह इस हवन के माध्यम से वह अपने अजन्मे अदृश्य ईश्वर के प्रति भाव पैदा करता है और उस अवस्था में मानसिक आनंद के चरम को पहुँचता है...!

इस चरम आनंद के फलस्वरूप मन विकार मुक्त हो जाता है......... और, मस्तिष्क और शरीर में श्रेष्ठ रसों (होर्मोंस) का स्राव होता है जो पुराने रोगों का निदान करता है.... और , नए रोगों को आने नहीं देता.

इसीलिए..... हवन करने वाले के मानसिक रोग (डिप्रेशन) दस-पांच दिनों से ज्यादा नहीं टिक सकते.

सिर्फ इतना ही नहीं......हवन में डाली जाने वाली सामग्री (ध्यान रहे, यह सामग्री आयुर्वेद के अनुसार औषधि आदि गुणों से युक्त जड़ी बूटियों से बनी होती है ) अग्नि में पड़कर ..... धुएँ के रूप में सर्वत्र व्याप्त हो जाती है...... जिससे .... वो घर के हर कोने में फ़ैल कर रोग के कीटाणुओं का विनाश करती है.

आज के वैज्ञानिक शोध से भी पता चला है कि ...... हवन से निकलने वाला धुआँ हवा से फैलने वाली बीमारियों के कारक ... और, इन्फेक्शन करने वाले बैक्टीरिया (विषाणु) को नष्ट कर देता है.
( reference -http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2009-08-17/health/28188655_1_medicinal-herbs-havan-nbri )

यहाँ ध्यान रखें कि..... विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार ......दुनिया भर में साल भर में होने वाली 57 मिलियन मौत में से अकेली..... 15 मिलियन (25 % से ज्यादा) मौत इन्ही इन्फेक्शन फैलाने वाले विषाणुओं से होती हैं.......!

वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि..... हवन करने से सिर्फ विषाणुओं से सम्बंधित ही नहीं..... बल्कि.... अन्य , और भी बहुत सी बीमारी खत्म होती हैं.......जैसे कि ......

१. सर्दी/जुकाम/नजला

२. हर तरह का बुखार

३. मधुमेह (डायबिटीज/शुगर)

४. टीबी (क्षय रोग)

५. हर तरह का सिर दर्द

६. कमजोर हड्डियां

७. निम्न/उच्च रक्तचाप

८. अवसाद (डिप्रेशन)

इन रोगों के साथ साथ विषम रोगों में भी हवन अद्वितीय है, जैसे

९. मूत्र संबंधी रोग

१०. श्वास/खाद्य नली संबंधी रोग

११. स्प्लेनिक अब्सेस

१२. यकृत संबंधी रोग

१३. श्वेत रक्त कोशिका कैंसर

१४. Infections by Enterobacter Aerogenes

१५. Nosocomial Infections

१६. Extrinsic Allergic Alveolitis

१७. nosocomial non-life-threatening infections

और ........ यह सूची अंतहीन है....!
और.... यह जानकार तो आप ख़ुशी से उछल ही पड़ेंगे कि..... वैज्ञानिक शोधों के अनुसार..... सौ से भी ज्यादा आम और खास रोग........ यज्ञ थैरेपी से ठीक होते हैं........!

और... यह बात तो हम सभी जानते हैं कि...... एक स्वस्थ व्यक्ति ही ..... स्वस्थ समाज एवं देश का निर्माण कर सकता है.....!

इसीलिए तो हमारे हमारे वेद कहते हैं कि....

हे मानवमात्र.....! हृदय पर हाथ रखकर कहना.......क्या दुनिया में कोई दूसरी चीज इन शब्दों का मुकाबला कर सकती है......????

हम हिन्दुओं को इस बात का गर्व होना चाहिए कि... इस तरह के न जाने कितने चमत्कारी, रोगनाशक, बलवर्धक और जीत के मन्त्रों से हमारी हवन की प्रक्रिया भरी पड़ी है. .... और, जिंदगी की सब समस्याओं का नाश करने वाली और सुखों का अमृत पिलाने वाली यह हवन क्रिया मेरी संस्कृति एवं हमारे धर्म का हिस्सा है...!

याद रखें कि..... हवन कोई कर्मकांड नहीं है. .... बल्कि, यह परमेश्वर का आदेश है,.... और, श्रीराम की मर्यादा की धरोहर है.... श्रीकृष्ण की बंसी की तान है......रण क्षेत्र में पाञ्चजन्य शंख की गुंजार है.....अधर्म पर धर्म की जीत की घोषणा है.....

सीधे शब्दों में ...... हवन जीत का संकल्प और......जीत की मुहर है.....!!

Good News For Diabetes.

inally Good News For Diabetes.

A woman (65) was diabetic for the last 20+ years
and
was taking insulin
twice a day.
She used the enclosed homemade medicine for a fortnight and
now she is absolutely free of diabetes and taking all her food as normal
including sweets.

The doctors have advised her to stop insulin and any other blood sugar controlling drugs.
I request you all please circulate the email below to as many people as you
can and let them take maximum benefit from it.

AS RECEIVED :
DR. TONY ALMEIDA
( Bombay Kidney Speciality expert )
made the extensive experiments with perseverance and patience and discovered a
successful treatment for diabetes.
Now a days a lot of people, old men &
women in particular suffer a lot due to Diabetes.

Ingredients:
1 - Wheat 100 gm
2 - Gum(of tree) (gondh) 100 gm
3 - Barley 100 gm
4 - Black Seeds (kalunji) 100 gm

Method of Preparation :
Put all the above ingredients in 5 cups of water.
Boil it for 10 minutes and put off the fire.
Allow it to cool down by itself.
When it has become cold, filter out the
seeds and preserve water in a glass jug or bottle.

How to use it?
Take one small cup of this water every day early morning when your stomach is empty.
Continue this for 7 days.
Next week repeat the same but on alternate days. With these 2 weeks of
treatment you will wonder to see that you have become normal and can eat
normal food without problem.

Note:
A request is to spread this to as many as possible so that others can
also take benefit out of it.

SINCE THESE ARE ALL NATURAL INGREDIENTS,
TAKING THEM IS NOT HARMFUL.
SO THOSE WHO ARE SCEPTICAL ABOUT THIS TREATMENT
MAY STILL TRY IT WITHOUT ANY HARM.
This is working...

नींबू के औषधीय गुण

आज हमारे आधुनिक होते जा रहे समाज में लोग नकली शीतल पेय पीते हैं और नीबू पानी से हाथ धोते हैं लेकिन आपको बताता हूँ सुबह-सुबह खाली पेट गुनगुना नींबू पानी पीने से वजन तो कम होता ही है, लेकिन यह इसके अलावा भी सेहत के लिए अन्य कई तरह से फायदेमंद है। 

नींबू के औषधीय गुण सर्वविदित हैं। इसमें एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल प्रॉपर्टीज और इम्यून सिस्टम मजबूत करने की ताकत होतीहै। वेट लॉस में नींबू का रस इसलिए कारगर है, क्योंकि यह हाजमा अच्छा करता है और लिवर को साफ रखता है।नींबू अनुष्ण अर्थात न अति उष्ण है, न अति शीत | यह उत्तम जठराग्निवर्धक, पित्त व वातशामक, रक्त, ह्रदय व यकृत की शुद्धि करनेवाला, कृमिनाशक तथा पेट के लिए हितकारी है | ह्रदयरोगों को ठीक करने में यह अंगूर से भी अधिक गुणकारी सिद्ध हुआ है | इसमें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध विटामिन ‘सी’ शरीर की रोगप्रतिकारक शक्ति को बढाता है |
क्यों लें सुबह?
आयुर्वेद के अनुसार गुनगुने पानी में नींबू का रस मिलाकर सेवन करने से शरीर के सभी टॉक्सिन्स बाहर निकल जाते हैं। लेकिन इसके अन्य कई फायदे भी होते हैं।हीलिंग में फायदेमंद नींबू में विटामिन सी, जिसे एस्कॉर्बिक एसिड भी कहा जाता है, काफी मात्रा में होता है। यह एसिड घाव भरने के के अलावा हड्डियों की देखभाल और टिश्यूज रिपेयर भी करता है।
इसलिए हीलिंग में फायदेमंद माना जाता है।

आमतौर पर जब भोजन में मौजूद पॉजीटिव चाज्र्ड आयन्स डाइजेस्टिव ट्रैक में पहुंचकर वहां मौजूद निगेटिव चाज्र्ड एंजाइम्स से मिलते हैं, तब शरीर को ऊर्जा मिलती है। नींबू उन चंद खाद्य पदार्थो में से एक है, जिसमें निगेटिव चाज्र्ड आयन्स की मात्रा ज्यादा रहती है। इसलिए जब यह डाइजेस्टिव ट्रैक में पहुंचते हैं तो तुरंत ही ऊर्जा मिलती है।

इसलिए भी लाभदायक
* हाजमा सुधरता है।
* शरीर का सिस्टम साफ रहता है।
* इम्यून सिस्टम मजबूत होता है।
* त्वचा साफ और चमकदार रहती है।
* वजन कम करने में मदद मिलती है।
* शरीर का पीएच लेवल संतुलित रहता है।